हर देश में तू ...

हर देश में तू ...
हर देश में तू , हर भेष में तू , तेरे नाम अनेक तू एकही है ।
तेरी रंगभुमि यह विश्वभरा, सब खेलमें, मेलमें तु ही तो है ॥टेक॥
सागर से उठा बादल बनके, बादल से फ़टा जल हो कर के ।
फ़िर नहर बनी नदियाँ गहरी,तेरे भिन्न प्रकार तू एकही है ॥१॥
चींटी से भी अणु-परमाणुबना,सब जीव जगत् का रूप लिया ।
कहिं पर्वत वृक्ष विशाल बना, सौंदर्य तेरा,तू एकही है ॥२॥
यह दिव्य दिखाया है जिसने,वह है गुरुदेवकी पूर्ण दया ।
तुकड्या कहे कोई न और दिखा, बस! मै और तू सब एकही है ॥३॥